वीस कोस सें गीरवर दीखे, भाग्यो भ्रम सकल जीयको....१
मधुवन उपर सीता नालो वाको नीर अधिक नीको....२
वीस टोंक पै वीस ही घूमटी, ज्यां बिच चरण जिनेश्वर को....३
आठ टोंक पश्चिम दिश वंदां द्वादश वंदा पूरव को...४
इन्द्र भूषण जी का सांचा साहिब सांचो शर्ण जिनेश्वर को....५
स्याद्वाद हिमगिरतें ऊपजी मोक्ष महासागर हीं समानी. १
ज्ञान विराग रूप दोउ ढाये संयम भाव मंगर हित आनी,
धर्मध्यान जहां भंवर परत हैं शम दम जामें शांतिरस पानी. २
जिन संस्तवन तरंग ऊठत है जहां नहीं भ्रम कीच निशानी,
मोह महागिरि चूर करत है रत्नत्रय शुद्ध पंथ ढलानी. ३
सुरनर मुनि खग आदिक पक्षी जहं रमंत हि नित शांतिता ठानी,
‘मानिक’ चित्त निर्मल स्थान करी फिर नहीं होत मलिन भवप्रानी.४