आगम केरा रहस्य खोल्यां कहान गुरुजी देवा,
भव्य जनोने पार उतार्या आप्या मुक्ति मेवा...धन्य० ९
धनधन वाणी देव – गुरुनी आतमनी हितकारी,
जयजय तारो जगमां होजो, हे जग मंगलकारी....धन्य १०
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श्री मुनिराज स्तवन
( मैं वीस जिनवरको चित्तमें लगाकर )
मैं परम दिगंबर साधु के गुण गाउं रे.....
मैं शुद्ध उपयोगी संतनको नित ध्याऊं रे....
मैं पंच महाव्रत धारी को शिर नाऊं रे....
जो वीस आठ गुण धरते, मन वचन काय वश करते,
बावीस परिषह जित जितेन्द्रिय ध्याउं रे....मैं० १
जिन कनक कामिनी त्यागी, मन ममता विरागी,
हो स्व-पर भेद विज्ञानी से गुण पाउं रे....मैं० २
जो हितमित वचन उच्चरते, धर्मामृत वर्षा करते,
सौभाग्य तरणतारण पर बलिबलि जाउं रे....मैं० ३
कुंदकुंद प्रभु विचरते, तीर्थंकर सम जो भरते,
ऐसे मुनि मार्ग प्रणेता को मैं ध्याउं रे....मैं० ४
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१३८ ][ श्री जिनेन्द्र