श्री मुनिराज – स्तवन
(तन मन फूला दर्शन पा....)
नित ऊठ ध्याउं गुण गाउं, परम दिगंबर साधु, परम दिगंबर साधु
महाव्रत धारी...धारी....महाव्रतधारी.....
राग द्वेष नहीं लेश जिन्हों के मनमें है....मनमें है;
कनक कामिनी मोह काम नहीं तनमें है...तनमें है;
परिग्रह रहित निरारंभी, ज्ञानी व ध्यानी तपसी....
ज्ञानी व ध्यानी तपसी
नमों हित कारी....कारी....नमों हितकारी...१
शीतकाल सरिता के तट पर जो रहते....जो रहते;
ग्रीषम ॠतु गिरिराज शिखर चढ अध दहते अघ दहते;
तरुतल रहकर वर्षामें, विचलित न होते लख भय
विचलित न होते लख भय
वन अंधियारी...भारी...वन अंधियारी...२
कंचन – काय मसान – महल सम जिनके है....जिनके है;
अरि – अपमान मान – मित्र सम तिनके है...तिनके है;
समदर्शी समताधारी, नग्न दिगंबर मुनि है;
नग्न दिगंबर मुनि है
भवजल तारी...तारी....भवजल तारी....३
भजनमाळा ][ १४१