Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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इम शुचि नाम अनंत तिहारे, तन मन पावन होत उचारे. १७.
विद्यमान वीस तीर्थंकर भगवंतोनी स्तुति
( दोहा )
द्वीप अर्द्ध-द्व्य मेरु पन, मेरु मेरु प्रति चार;
विहरत विभव अनंतयुत, अवनि विदेह मझार.
( छंदः चंडी १६ मात्रा )
सीमंधर सुखसीम सुहाये, युगमंधर युग वृष प्रकटाये;
बाहु बाहुबल मोह विदार्यो, जिन सुबाहु मनमथमद मार्याे. १.
संजातक निज जाति पिछानी, स्वयंप्रभु प्रभुता निज ठानी;
ॠषभानन ॠषि धर्म प्रकाशन, वीर्य अनंत कर्मरिपु नाशन. २.
सूरप्रभु निजभा परिपूरन, प्रभु विशाल त्रिकशल्य विचूरन;
देव वज्रधर भ्रमगिरिभंजन, चंद्रानन जगजनमन रंजन. ३.
चंद्रबाहु भवताप निवारी, ईश भुजंगम धुनि-मुनि धारी;
ईश्वर शिवगवरी दुःखभंजन, नेमिप्रभु वृष नेमि निरंजन. ४.
वीरसेन विधि-अरि-जय वीरं, महाभद्र नाशक भवपीरं;
देव देवयशको यश गावे, अजितवीर्य शिवरमनि सुहावे. ५.
ये अनादि विधि बंधनमांही, लब्धियोग निज निधि लखि पाई;
सम्यक् बल करी अरि चकचूरन, क्रमतें भये परम द्युति पूरन. ६.
१५० ][ श्री जिनेन्द्र