( अडिल्ल छंद )
जो भविजन जिन विंश यजे शुभ भाव सुं,
करे सुगुन गनगान भक्ति धरि चाव सुं;
लहे सकल संपत्ति अर वर मति विस्तरे,
सुरनर पद वर पाय मुक्ति रमनी वरे.
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[१]
श्री सीमंधार जिन – स्तवन
( दोहा )
शिव शिवमय शिवकर शिवद, शिवदायक शिवईश;
शिव सेवत शिवमिलन हित, सीमंधर जगदीश.
( चोपाई )
जय जगपति वरगुन वरदायक,
केवलसदन मदन मदघायक;
पर्म धर्म धर भ्रमपुर नाशन,
शासनसिद्धि अचल अचलासन. १
अखट अघट रस घटघट व्यापक,
अनहत आहत सुगुन प्रकाशक;
धरत ध्यान दुरगति दुःखवारन,
जग जलतें जगजंतु उधारन. २
१५२ ][ श्री जिनेन्द्र