अशरन शरन मरन-भय-भंजन,
पंकज वरन चरन मन रंजन;
निज सम करत जु मन तुम धारत,
ज्यों पावक संग इंधन जारत. ३
नृप श्री हंस तनुज वर आनन,
लंछन वृषभ लसत अघभानन;
पुंडरपुरी पुर है मनभावन,
सो तुम जनम योग भयो पावन. ४
लियो जनम जगजन दुःख नाशन,
शिर अमरेश धरत तुम शासन;
होत विरक्त देव-ॠृषि आवन,
भयो परम वैराग्य दिढावन. ५
शिबिका दिव्य कहार पुरंदर,
हो सवार जिन धर्म-धुरंधर;
संग सकल तजि व्रत धारी पावन,
लगे ध्यान मारग शिव जावन. ६
करि वटमार घातियाचूरन,
शक्ति अनंत सजी परिपूरन;
पूरव जनम भाव वर भावत,
ता फल ये अतिशय दरसावत. ७
भजनमाळा ][ १५३