बिन इच्छा विहार सुखकारन,
भव्यनकुं भवपार उतारन;
यदपि देव तुम द्रष्टि अगोचर,
तदपि प्रतीति धरत हम निज उर. ८
जानत हूं तुम हो जगजानन,
मैं किम दुःख कहूं चतुरानन;
दीनबन्धु दुःख दीन मिटावन,
चहिये अपनो विरद निवाहन. ९
( हरिगीत )
वर वरन भवतपहरन आनन्दभरन द्रग मन भावने,
युत सुरस पूरति गंध शुभ भविवृन्द अलि ललचावने;
सर्वज्ञ आगम विटपके शुचि सुमन वरन रसाल ये,
धरि सुमति गुन सह ‘थान’ उर जगभालकी जयमाल ये.
( अडिल्ल )
सीमंधरजिन पूजि करे जो थुती भली,
दहे सकल अघवृन्द लहे मनकी रली;
निर आकुल ह्वै हरे मोह द्वंदकुं,
टारे भ्रम आताप लखे चितचंदकुं.
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१५४ ][ श्री जिनेन्द्र