[२]
श्री युगमंधार जिन स्तवन
( दोहा )
करे विविध लीला ललित, सुगुनगेह निज भोग,
शिवश्यामा संगम भए, गये विरूप वियोग.
( सुंदरी छंद )
मैं अनादि रच्यो पर रूपमें, नहि लख्यो निज आतम भूप में;
सुन दयाल सहे दुःख मैं महा, सब प्रतक्ष दूरे तुमतें कहा. १
अब कछु वर लब्धि वसायके, श्रवनद्वार गिरा तुम आयके;
उर प्रवेश कियो सुखदायिनी, सकल विभ्रम मोह विथा हनी. २
सहित सो अविधेय विधानतें, मिलत है संबंध कथानतें;
निज प्रयोजन इष्ट सु तासमें, लसत साधन शक्य सु जासमें. ३
सर्व ज्ञायक भाषित पावनी, है अनादि कृपा सरसावनी;
विगत लोक विरुद्धनतें भली, निज प्रतीति स्वयं अनुभौ रली. ४
अलख हे जिन ! तू मम नैनतें, लखि तथापि लियो तुव वैनतें;
सुनी सु तत्त्व गिनी सरवज्ञता, विगत दूषणतें सु विरागता. ५
सुखद वैन प्रतच्छ प्रकाश है, त्रिविध लक्षन आप्त सु वास है;
दम दया तप ये सुखदाय है, सब मती इम कहत सुनाय है. ६
जित नहीं यह मूर सुखी नहीं, घर तजो परिपूर सुखी वही;
अतुल लक्ष्मी लहे किम तो विना, नरकदायक लक्ष्मी लहै घना. ७
भजनमाळा ][ १५५