Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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[८]
श्री अनंतवीर्य जिनस्तवन
( दोहा )
धन्य जगतपति जन्म तुम, मनहु सुमंगलप्रात,
खिले भविनजिय-जलज जिम, नस्यो अमंगल व्रात.
( चौपाई )
सुनो अनंतवीर्य जिनदेव, भूलि भाव वश तें स्वयमेव;
भावकर्म रागादिक भाव, द्रव्यकर्म वसु प्रकृति स्वभाव.
देहादिक नोकर्म सु येह, लगे अनादि संग मम तेह;
सागर बंध लिये थिति सोहि, काल अनंत भ्रमायो मोहि.
योजन एक बडो गहराय, इतनो ही मुख वेध सुभाय;
ऐसो कूप कलपना करे, ताकूं पुनि ऐसी विध भरे.
उत्तम भोगभूमि वर खेत, ता मधि जो उपजे शुभ हेत;
भेड सूनु कच अग्र सुलेत; खंड सूक्ष्म तिनके करि लेत.
भरी तामें काढे इह भाय, खंड एकशत वर्ष विताय;
कूप उदर जब खाली होय, सो व्यवहार पल्य करि जोय.
वर्ष असंख्य कोटी सम थान, तिन रोमनिकी राशि प्रमान;
करि कल्पना घात तिह करे, समय समय प्रति एक जु हरे.
भजनमाळा ][ १६९