( भ्रमरावली छंद )
अगतागत तूं विगता विधिबंधविथा,
असमं वरभूतियुत अनुभौ शुरता;
धरता वरवैन सुधा शिव ! तूं शिवदा,
हमकुं वर भक्ति मिलो कर श्रेय सदा.
( अडिल्ल छंद )
देव अनंतवीर्य पदपंकज पावने,
पूजे भव्य उचारि सुगुन मन भावने;
तन मन पावन तास होत सब सुख सरे,
आकुल दाह विहाय निराकुलता वरे.
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श्री सूरप्रभ जिन – स्तवन
( दोहा )
पूरि परमद्युति तें रहे, भूरि भरमतम चूर;
हनि कुतर्क तारक प्रभा, सूर प्रभु वच सूर.
( तोटक छंद )
तव ज्योति स्वरूप घटे न हटे, तिहिकु मत सर्व सदैव रटे;
अकलंक चिदंक समं असमं, वृष अंक निःशंक स्वयं विषमं. १
भजनमाळा ][ १७१