इंद्रहूतें अमित विशाल है विभूति जास,
चरन रसाल सेवे सुमति विशाल है;
धारे दिव्य देह है विशाल भूविदेहहीमें,
सुगुन विशाल देव कीरत विशाल है.
( दोहा )
इक ग्रही ग्रह्यो अनंत जग, इक लखी लख्यो अनंत;
इक रमी रमे अनंत सुख, जिन विशाल जयवंत.
( मुरारी छंद-मात्रा १६ )
जिन विशाल अरजी सुन मोरी, शरन आय पकरी अब तोरी;
फसत पाटलट आगहि जैसे, करमबंध जु करे हम तैसे. १
भ्रमवशाय परकुं निज जान्यो, निज स्वरूप अपनो न पीछान्यो;
विविध दुःख भवमें जु लहाये, नहि जु जात इक मुखतें गाये. २
नरकभूमि भयदा अधिकाई, जुत प्रमाद हति जीवन पाई;
डंक सहस विछूवा मिल मारे, परस पीर इतनी विसतारे. ३
उसन शीत अति चंड तहां है, गिरत मेरु सम लोह गला है;
जनमथान अति ही भयदाई, सकल रोग बहु है दुचिताई. ४
करत मार करुना नहि लावे, कलह रैन दिन तहां सुहावे;
निमिष मात्र तिसमें सुख नांही, पचत दुःख दव अग्नि जु मांही. ५
तलत तेल मधि पावक जारे, पकर पांव भुविमांहि पछारे;
हनत हाड उर अंतरजाली, मरम भेद कर होत बिहाली. ६
१७४ ][ श्री जिनेन्द्र