धरि करोत लकरीवत वेरे, धारि यंत्रमधि तहां सु पेरे;
तिल समान सब ही तन खंडे, मरन काल विन प्रान न छंडे. ७
सकल लोक अन्न जो भख लेवे, तदपि भूख नहीं शांति जु देवे;
सकल सिंधु जलपान जो ठाने, तनक नाहि तिनकी तिस भाने. ८
मिलत नांही कण अन्न जहां है, जल न बुन्द समसो जु लहा है;
अगिनियोग कर ताम्र गलावे, मधुकुपान करके वह पावे. ९
करत नीच पल भक्षन जो हैं, भखत जोझी तिनके तनकुं है;
रुधिर राध स्रवती दुःख दैनी, प्रबल क्षारयुत है सुखखैनी. १०
करी जु लोह पुतरीजुत पावे, पर सु भामरत कूं लिपटावे;
नेत्रनितें जु करत कुटिलाई, हरत तास द्रग करि निठुराई. ११
वदत वैन परकुं दुखदाई, करत तास रसना तिह ठांई;
सकल दुःख समुदाय जहां है, ससनचाल विकराल तहां है. १२
वन जु भीम शिखरी भयदाई, करत घाव असिपत्र तहां ही;
नहीं समान कोउ दुःख तातें, कहन कौन सक कोट मुखातें. १३
लहत आयु तहं सागरमानं, इम दुःखौघ हम सहे अमानं;
पशु कुयोनि मधि जो दुःख पाये, प्रकट तोहि कछु नांही दुराये. १४
दरश हीन सुरहु दुःख पावे, परविभूति लखि के ललचावे;
मुरझी माल जब जात अगारी, मरन जानी दुःख ऊपजे भारी. १५
चवत देख वनिता दुःख पावे, तनक नांही वरन्यो वह जावे;
मनुषयोनि अति पावन सोउ, सुखित नांही तिसहु मध कोउ. १६
भजनमाळा ][ १७५