वय जु बाल परके वश जानो, विविध रोग करी संयुत मानो;
तरुन भोगवश यौवन मांही, प्रबल आश वय मध्य तहांही. १७
शुभवियोग दुःखयोग लहावे, शिथिल अंग वयवृद्ध कहावे;
बिन पिछान अपनी मर जावें, थिर विना न थिरता कहुं पावे. १८
तुम स्वरूप थिर हो थिरगामी, थिर सुथान करता थिरनामी;
थिर स्वभाव हमकूं दरसावो, दुःखित जानि करुना उर ल्यावो. १९
भ्रमन मेटि भवतें जु उबारो, अब विलंब मनमें न विचारो;
भुवन ईश शरनागत तोरे, करत ‘‘थान’’ विनति कर जोरे. २०
( तोटक छंद )
कपटी लपटी सुहटी अति मैं, न घटी ममता सु जटी उरमें;
तुमरो गुनगान सुठानत हूं, समये जु वही धनि मानत हूं.
( अडिल्ल छंद )
जिन विशाल पद भक्ति विशाल धरें यजें,
ता नरकुं सब विपत्ति ततछिन ही तजें;
तन सुंदर सर्वांग सुभग छबि कुं वहे,
टरे अमंगलवृंद सदा मंगल लहे.
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१७६ ][ श्री जिनेन्द्र