Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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[११]
श्री व»धार जिनस्तवन
(चंद्रावर्त छंद)
वज्र अस्थिन सकिल जु सकलं, वज्र जेम तनकी द्युति अमलं;
शील वज्र गहि कैं गिरि हरता, देव वज्रधर तुं जग भरता.
(मोतीदाम छंद)
अतत्त्व प्रतीत जु वज्र महान, विदारनकुं कन वज्र महान;
चये तुम कोमल वैन जगीश, गुहे तिनकुं गहिके गन ईश.
कह्यो सब जीव अजीव स्वरूप, भने विधि बंधन कुं दशरूप;
मिले सब जीव रू कर्म संयोग, बने तहं बंध महा दुःखयोग.
जबे रस देत उदै वह जानि, उपाय बसें सु उदीरण मानि;
कहे जबलों वरनो सत्त तास, बढे थिति सो उतकर्षण भास.
घटे थिति सो अपकर्षणरूप, ह्वै जब संक्रमण पररूप;
उदीरण ता विन है उपशम, उदीरण सक्रमणं सु जुगम्य.
नहीं जहं येह निधत्ति सुतेह, निकांचितमांहि नहीं चव येह;
जहां उतकर्षणको न प्रसंग, कछु अपकर्षणको नहीं अंग.
उदीरण संक्रमण जुग नांही, इन्हीं बशि जीव भ्रमें भवमांही;
सुचिंतन पावक वज्र प्रजारी, दशुं विधि बंध किये तुम छारी.
छाई निज ज्योति सबें जगपूर, भये भवि जीवन के दुःख चूर;
कह्यो दश धर्म सु जाति स्वभाव, मनुं भववारिध को वर नाव.
भजनमाळा ][ १७७