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श्री व»धार जिन – स्तवन
(चंद्रावर्त छंद)
वज्र अस्थिन सकिल जु सकलं, वज्र जेम तनकी द्युति अमलं;
शील वज्र गहि कैं गिरि हरता, देव वज्रधर तुं जग भरता.
(मोतीदाम छंद)
अतत्त्व प्रतीत जु वज्र महान, विदारनकुं कन वज्र महान;
चये तुम कोमल वैन जगीश, गुहे तिनकुं गहिके गन ईश. १
कह्यो सब जीव अजीव स्वरूप, भने विधि बंधन कुं दशरूप;
मिले सब जीव रू कर्म संयोग, बने तहं बंध महा दुःखयोग. २
जबे रस देत उदै वह जानि, उपाय बसें सु उदीरण मानि;
कहे जबलों वरनो सत्त तास, बढे थिति सो उतकर्षण भास. ३
घटे थिति सो अपकर्षणरूप, ह्वै जब संक्रमण पररूप;
उदीरण ता विन है उपशम, उदीरण सक्रमणं सु जुगम्य. ४
नहीं जहं येह निधत्ति सुतेह, निकांचितमांहि नहीं चव येह;
जहां उतकर्षणको न प्रसंग, कछु अपकर्षणको नहीं अंग. ५
उदीरण संक्रमण जुग नांही, इन्हीं बशि जीव भ्रमें भवमांही;
सुचिंतन पावक वज्र प्रजारी, दशुं विधि बंध किये तुम छारी. ६
छाई निज ज्योति सबें जगपूर, भये भवि जीवन के दुःख चूर;
कह्यो दश धर्म सु जाति स्वभाव, मनुं भववारिध को वर नाव. ७
भजनमाळा ][ १७७