लहें तुम ध्यान किये निरवान, कहा विस्मय इसमें भगवान;
तपोधन तो गुनमें मन धार, करे जगजंतु सुखी भयटार. ८
पशुगन हुं तुम नाम रटात, विवेक विना पदवी सुरपात;
लखें तुमरी छबिकुं भरि नैन, कहे महिमा तिनकी किम बैन. ९
अहो तुम जन्म भयो इह ठाम, लह्यो सुख नारक हु अघधाम;
अगोचर अक्ष निजातम रूप, तुम्हें उर धार लखें मुनि भूप. १०
मथें तुम वैन सुकोमल दारु, जगें कर जोरि कृशानु विचारु;
जरें घन मोह महावन भूरि, लसें निज ज्योति सबे जगपूरि. ११
ज्योत तुम वैन करिद सरूप, करे चिद चिंतन केलि अनूप;
अनंत नयातम अंग विशाल, हिताहित बोध सु उन्नत भाल. १२
सुग्राहक भाल लसे वर सुंढ, फबें सित दंत प्रमान अखंड;
कृपाकर नीरत मत्त महान, झरें नयगंडन तें पयदान. १३
रही मंडी भव्य सिलीमुख भीर, धरें समता मय गोनस धीर;
करे उपदेश सु गर्ज निषाद, उदै शुभ सुंदर घंट निनाद. १४
अनातम भाव अनोकुहखंडि, दई भवसंसृति बेल विहंडि;
महामुद मंगलकुं प्रगटात, लखे मुनि भूपनिकुं ललचात. १५
यहै वर वानिक सो सुखदैन, बसो हमरे उरमें दिनरैन;
करो करुना करुनाजल सिंधु, सही तुम दीननके वरबंधु. १६
तुंही पदपंकजको उर वास, रहो जबलों नहीं बंधनि नास;
प्रतीति तुंही वचकी वरदेव, रहे नित ही चरणांबुज सेव. १७
१७८ ][ श्री जिनेन्द्र