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श्री चंद्रबाहु जिन – स्तवन
( दोहा )
हंस संत मन मानसर, भवदुःखकंज तुषार;
सुख समुद्र वर्द्धन विधू, चंद्रबाहु जयकार.
( दीपकला छंद )
यहु जगत जलधि ताको न तीर, षटद्रव्य शक्ति सत्ता सुनीर;
व्यय उत्पत्ति ध्रौव्य तरंग जास, भरपूर भर्या नहीं आदि तास. १
शुद्ध द्वीप बसे सुख रत्नपुर, दुरगति दुःख जलचर वसत दूर;
वडवानल मोह महा प्रचंड, विधि उदय मोज ऊछले अखंड. २
चढीकें पर परणति पोत भूरि, मद मत्सर तम तस्कर करूर;
विचरें दुरलालचके निकेत, धन संतनके गुन हतन हेत. ३
इहको नहि थाह वहूं जिनेश, तुम ज्ञान विषे झलके अशेष;
निजगुन मुक्ताफल गहनहार, भवि जीव रचे ऐसो प्रचार. ४
जिन वचन प्रतीति जिहाज सार, सत गुरु शुभमग दरसानहार;
एसे करीके जु करें प्रवेश, या विधि पुनि श्रम ठाने सुवेश. ५
वैराग्य दशा भाजन मझार, बैठे दुरमति सब कर उघार;
द्रढ सांकल सुरति सु जोरि तास, राखें निजथान लगाय जास. ६
जग आशा तजीके ह्वै निःशंक, जगदीश्वरके ध्यावे चिदंक;
ऐसे स्वरूप जलमें अपार, खोजें अपने गुन वारंवार. ७
१८२ ][ श्री जिनेन्द्र