Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 182 of 208
PDF/HTML Page 192 of 218

 

background image
[१३]
श्री चंद्रबाहु जिनस्तवन
( दोहा )
हंस संत मन मानसर, भवदुःखकंज तुषार;
सुख समुद्र वर्द्धन विधू, चंद्रबाहु जयकार.
( दीपकला छंद )
यहु जगत जलधि ताको न तीर, षटद्रव्य शक्ति सत्ता सुनीर;
व्यय उत्पत्ति ध्रौव्य तरंग जास, भरपूर भर्या नहीं आदि तास.
शुद्ध द्वीप बसे सुख रत्नपुर, दुरगति दुःख जलचर वसत दूर;
वडवानल मोह महा प्रचंड, विधि उदय मोज ऊछले अखंड.
चढीकें पर परणति पोत भूरि, मद मत्सर तम तस्कर करूर;
विचरें दुरलालचके निकेत, धन संतनके गुन हतन हेत.
इहको नहि थाह वहूं जिनेश, तुम ज्ञान विषे झलके अशेष;
निजगुन मुक्ताफल गहनहार, भवि जीव रचे ऐसो प्रचार.
जिन वचन प्रतीति जिहाज सार, सत गुरु शुभमग दरसानहार;
एसे करीके जु करें प्रवेश, या विधि पुनि श्रम ठाने सुवेश.
वैराग्य दशा भाजन मझार, बैठे दुरमति सब कर उघार;
द्रढ सांकल सुरति सु जोरि तास, राखें निजथान लगाय जास.
जग आशा तजीके ह्वै निःशंक, जगदीश्वरके ध्यावे चिदंक;
ऐसे स्वरूप जलमें अपार, खोजें अपने गुन वारंवार.
१८२ ][ श्री जिनेन्द्र