Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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दिशि ओर धरे रंचक न ध्यान, तब पावत है अक्षय निधान;
जिन सो निज निज सो जिनस्वरूप, करके प्रतीति ह्वै जगतभूप.
वर भक्ति तिहारी तें जिनंद, प्रगटे सुख नानाविध अमंद;
इम मुनिजन मिल निहचे सुकीन, तुम ध्यान विषे नित होत लीन.
ते पावत हैं शुचि शक्ति सार, सो सुरपति हू में न लगार;
तुम धन्य जगोत्तम देवदेव, नित करत पाक शासन सुसेव. १०
वसु द्रव्य चढावत धरि उमंग, पुनि नाचत राचत भक्ति रंग;
विरयां समान रचि सब सुठाट, करि तन छिन लघु छिनमें विराट. ११
सजि स्वांग विविध विधिके अनूप, सरसात नवुं रस देवभूप;
वर भूषन भूषित लसत अंग, मनु भूषणांग सुरतरु चलंग. १२
धुनि भूषण मुखवादित्र भूरि, मिलि एक सनाको सुरहि पूर;
समसुर त्रिताल त्रयग्राम धारि, लय ललित तरल तानें अपार. १३
ततता ततता वितता भनंत, थेईता थेईता थेईता चलंत;
छुम छुम छुम घुंघरू घमक चंग, द्रुम द्रुम द्रुम द्रुम बाजत मृदंग. १४
सनन ननन सारंगी उचार, तूं तूं तननं तननं सितार;
तं तनन तनन मुहचंग चंग, झनझनझन झुनके जलतरंग. १५
टमटमटमटम टंकार पूरि, मंजिर बजें सुरतें सनूरि;
करतार झरर झररर झुनंत, समपे सब आवत एकतंत. १६
छिनमें जुग बाहुनकुं पसार, सोहे चल कर पल्लव अपार;
इक कर कटि धरि करि ग्रीव बंक, इक कर शिर धरि नाचे त्रिबंक.१७
भजनमाळा ][ १८३