मुकुटाकृति द्वैकर शीस धार, रतनांगणमें विचरे अपार;
झट झट झट अनहद होत पूर, इह झुरमट राजे जिन हजूर. १८
फिर फिर फिर फिर फिरकी सुखात, पग नूपुर झुननन झुनन नात;
शिर शेखर रत्नप्रभा सु सार, चक्राकृति ह्वै झलके अपार. १९
मकरा कृत कुंडल झुलत कान, जिली सम सोहत चल महान;
छिन भूपरि छिन नभमें लसंत, परसें शशि उडु अवनी महंत. २०
छिनमें इक ह्वै छिनमें अनेक, दरशात विबुधपति विविध भेक;
सुरनर मुनि मनरंजन विधान, ताको कवि कौन करे बखान. २१
हरि उर सर पूरित भक्ति नीर, तव दरशन मनु परसी समीर;
इह लीला ललित तरंग रूप, तन मन पावन कारन अनूप. २२
मैं मो मन पावन करन हेत, उचरी मुख सुंदर सुख निकेत;
अब ‘थान’ यही जाचे जिनंद, तव भक्ति बसो उरमें अनंद. २३
( कुंडलिया छंद )
देवानंद पिता सुखद, मात रेणुका जास,
लसे पद्म लछण धुजा, नगर विनिता तास.
नगर विनिता तास जन्मतें ही अति पावन,
भविजन वृंद चकोर लोल लोचन ललचावन.
सदा उदित मुखचंद करूं ताकी नित सेवा,
चंद्रबाहु जयवंत सकल देवनके देवा.
१८४ ][ श्री जिनेन्द्र