( अडिल्ल छंद )
जयमाला जयदाय चंद्रबाहु तनी,
जो उचरे धर भक्ति छारि मनकी मनी;
घनी कहा यह बात कष्ट करी जानकी,
जन्म मरन मिटि होत अचलता ज्ञानकी.
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[१४]
श्री भुजंगम जिन – स्तवन
(दोहा)
जगत भ्रमन हरि अशन करि, प्रकट कालके काल;
लसत ज्ञानमनितें अमल, जिन भुजंग वरमाल.
( चाल रेखता छंद )
सुनो अरजी अबे मोरी, हुआ गरजी निहारुं में.....(टेक).
चिदानंद मैं अनादि हूं, नहीं कुछ आदि है मोरी;
सिवा अपनी चतुष्टयके, नहीं पर वस्तु मेरे में...सुनो० १
असल मालूम न थी मुझको, अबे गुरु बैन तें जानी;
किये जड कर्म कुं संगी, परी ये भूल मेरे में...सुनो० २
लगा इनकी मुहब्बतमें, लुटाया ज्ञानधन मैंने;
अहो उपकार ए साहिब! किये इनपें घनेरे मैं...सुनो० ३
भजनमाळा ][ १८५