विहीने ज्ञान जड ये है, नहीं चैतन्यता इनमें;
कृतघ्नी होय के मोकुं, भ्रमाया गति चारों में...सुनो० ४
अगोचर बैन विन उपमा, सहे दुःख नर्क दारुन में;
जहां पल एक कल नांही, कहा मुख तें उचारूं में...सुनो० ५
निगोदी मोहीकुं कीना, दूराया ज्ञान कुं ऐसा;
रहा इक वर्ण व्यंजनके, अनंते भाग मेरे में...सुनो० ६
उसास-निसास एक मांही, किये मैं क्षुद्र भव ऐसे;
अठारे बार हे साहिब! अहो जनम्या मरा हूं मैं...सुनो० ७
पशु परजाय जो पाई, सहायी को नहीं तामें;
नहीं धन धाम शामा को, नहीं वच आस्य मेरे में...सुनो० ८
क्षुधा रुजा चंड है जामें, तृषा अति ही भयंकर है;
मिलै तृण अन्नजल मुशकिल, लिखा जब भाग मेरे में..सुनो० ९
कही जाती नहीं मुखतें, हुई जो व्याधि तनमांहि;
सही को कौनविध जाने, सही मन ही जु मेरे में...सुनो० १०
लदा बोझा बडा भारी, दई मारें मरम भेदी;
नहीं ताकत मजल दूरी, पडी मुशकिल जु मेरे में...सुनो० ११
सही हिम घाम घन बाधा, कही क्यों हूं नहीं जाती;
मरा जल ज्वालके मांहीं, सु जाहिर ज्ञान तेरे में...सुनो० १२
कसाईने ग्रहा करमें, नहीं उरमें दया जाके;
करी है त्रास दे दे कें, जुदाई प्राण मेरे में...सुनो० १३
१८६ ][ श्री जिनेन्द्र