कभी पैदा हुआ वनमें, बडा डर क्रूर जीवोंका;
जहां रहना उसी थलमें, सदा डरता रहा हूं मैं...सुनो० १४
कभी जलमें जनम पाया, मुझे खाया जबर दस्तों;
निबल मुझसे निगह आया, गया वो पेट मेरे में...सुनो० १५
हुआ पक्षी उडा नभमें, रहा डरता शिकारिन से;
सहायी को नहीं हुआ, गिरा जब फंद उसके में...सुनो० १६
कभी नर जन्म भी पाया, तहां रागादि बहु व्यापे;
सही बाधा वियोगादिक, कहूं कबलों घनेरी में...सुनो० १७
विभव परकी निरख झूरा, लखी जब माल मूरझानी;
लहे दुःख देव ह्वै ऐसे, बसें मन ही जु मेरे में...सुनो० १८
लही लख योनि चोरासी, अनंती वेर गही छांडि;
भ्रमन तिहूं लोकमें कीना, भई थिरता न मेरे में...सुनो० १९
जिते दुःख हैं जगतमांही, बचे कोऊ नहीं मोतैं;
इन्हीं वसी भूलिकें भोगे, खता कुछ नाहीं मेरे में...सुनो० २०
तूं ही हाकिम गवा तूं ही, तूं ही लिखिया खुलासे कर;
खलासी कीजिये इनतें, रहें फिर नांही मेरे में...सुनो० २१
दयासिंधु कहावे तो, दया मो दीन पैं कीजे;
दिखा निजरूप की झांकी, चहूं क्या ओर तुझसे में...सुनो० २२
लहूं अनुभूति में मेरी, रहूं निजधाममें सुखसें;
चहे ये ‘थान’ भव भवमें, यजूं पद कंज तेरे में...सुनो० २३
भजनमाळा ][ १८७