( शार्दूलविक्रीडित छंद )
संयुक्तं सुबलं महाबल पिता, नग्री जया जन्मभू,
सीमा रूपसुबुुद्धि मात महिमा, चिह्नं सुचंद्रान्वितं;
संसंतानंद पूर भूरि सुखदं, दूरी कृतं दुदुंखं,
लोकालोकविलोक शोकदलनं देवं भुजंगं नमः.
( अडिल्ल छंद )
जिन भुजंग युति करत दुरित सबही डरें,
ध्यान द्वार उर धरत कर्म दादुर डरे;
टरें सकल भवपीर पीर परगुन तनी,
होत सिद्ध सब काज ॠद्धि अतुलित घनी.
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श्री £श्वर जिन – स्तवन
(दोहा)
शंकर शं करि सकल के, हरि विकलप गन भूरि;
पूरि पूरि उर सर सुरस, चूरि चूरि दुःख चूरि.
( दीपकला छंद )
जय ईश्वर देव कृपा निधान, चित्त कोक शोक दल दिन समान;
भविवृंद कोकनदकुं कलिंद, शिववधू वदन पंकज मलिंद. १
१८८ ][ श्री जिनेन्द्र