सजि ध्यान जुगल भुजबल अखंड, जय मल्ल मोह जीत्यो प्रचंड;
तुम जय जय जय जग जलधि सेतु, निरमद कीनो रिपु मकर केतु. २
तुम नाम मंत्र महिमा अपार, अघ घनवन जारनकुं तुषार;
ताके प्रभाव विष नशत भूर, नहि डंक सके विषधर करूर. ३
मृगपति पद चाटत ह्वै सपेम, मदपूरित कुंजर शिष्य जेम;
थल सम जल जल सम अगनि होत, दुरजन उर सज्जनपन उद्योत.४
नृप कुपित कृपा ठानें अपार, रुजवृंद सकल नाशे असार;
इक छिनमें दुःख दारिद्र खोत, सब शोक नशे आनंद होत. ५
कहूं डायनि शायनि भूत प्रेत, भय कर न सके दुरमतिनिकेत;
सुत पंडित सुभग सुशील वाम, याचे किंकर वर सुमतिधाम. ६
जिहतें यश वरनत नाग ईश, वृषप्रीतिभाव वरतें मुनीश;
यातें महिमा कछु नांही जास, जिहतें प्रगटे चिदगुन प्रकाश. ७
उचरे छिन अंत समै सुजास, नर पामर पावत नाक वास;
वरमाल धरे उर मुक्तिवाल, सहजानंद सुख ऊपजे विशाल. ८
दुरजय विधि बंधन होत दूरि, दुःख जनम मरन व्यापे न भूरि;
इक जनम अलप सुखके प्रकाश, सुरतरु चिंतामणि सम न जास. ९
यह अशमशक्ति महिमा निधान, नहि वरन शके धरि चार ज्ञान;
ये जगत शिरोमणि मंत्रराज, दुरगति दुःखभंजनको इलाज. १०
जब लों स्वतंत्र होवे न जीव, ये मंत्र बसो उरमें सदीव;
अरजी येही अविधारि देव, भव भव दीजे तव चरन सेव. ११
भजनमाळा ][ १८९