Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 190 of 208
PDF/HTML Page 200 of 218

 

background image
गुनगान सुधारससें किलोल, मनमच्छ करन चाहे अडोल,
मति होहु अश्रव्याभाव अंश, निवरो अज्ञान दुरभाववंश. १२
भवभव सज्जन जनको सुसंग, निजचिंतभाव वरतो अभंग;
वर देहु यहे करुनानिधान, कर जोरि जुगल जाचें सु ‘‘थान’’. १३
मेरी करनी पर मति निहारी, निज प्रणत पालपनकुं विचारि;
करतें कर गहि लखी दीन मोहि, करनो विलंब छाजे न तोहि. १४
( सुरस छंद )
नृप मलिसेन तात अरु माता, ज्वाला सुज्वस मही,
नगर सुसीमा जास जनम हित, स्वर्ग समान भई;
जीतें मोह सूर्य लक्षनकी, जयध्वज फहर रही,
ता ईश्वरकी जयमाला यह, जयदा होहु सही.
( दोहा )
जिन ईश्वरकी थुति यही, उचरत शुद्ध सुभाय,
प्रकटें सहजानंद सुख, सकल विघ्न टरि जाय.
( अडिल्ल छंद )
जिन ईश्वर पदकंज सरस मन भावने,
जो पूजे मनलाय सांख्य सरसावने,
कामधेनु समता प्रकटे उर जासके,
तृष्णा डायन वीर लगे नहि तासके.
१९० ][ श्री जिनेन्द्र