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श्री नेमिप्रभु जिन – स्तवन
( दोहा )
जसु वच विमल कृशानुझल, दुरनय वचन पतंग;
गिरत विसन निज विजयहित, होत आपही भंग.
कृपा सदन मद मदन दल, विधि खल बल क्षयकार;
नमुं नेमिपद कमलयुग, अशरन शरन अधार.
( तारकवरन छंद )
तुम तो प्रभु नेम त्रिलोकधनी हो,
तुमरी महिमा नहि जात भनी हो;
इक ही गुन ज्ञान अमान अनै सो,
वरुन्यो न जहे जिम है तिम तैसो. १
षट्द्रव्य असंख्य अनंत प्रमाने,
नहीं अंत अनादिहितें थिति ठाने;
सबही गुण औघ अनंत सुधारें,
गुण हु पर्याय अनंत विथारें. २
सु बहें गत वर्तत आगत जे हैं,
झलके तुमरे निजभाव विषे हैं;
तुमरो उर ध्यान सुभान प्रकाश्यो,
भ्रम भाव विभावरिको तम नाश्यो. ३
भजनमाळा ][ १९१