विकसी शुभ आस्रव राजिवराजी,
उडुवृंद दुरास्रव ज्योति न साजी;
चकवी सद्बुद्धि हिये हुलसाई,
उलवा अविवेक न देत दिखाई. ४
भवसंसृति बेलि भई भय कुमलानी,
वर भांति पदारथ पांति पिछानी;
कुनया व्यभिचारनि जेम दुरी है,
गति मोहनिशाचरकी न फुरी है. ५
सु सुधारस-प्यास प्रचंड बधाई,
प्रगटी व्रत-भोजनकी सु क्षुधा ही;
वट मार महा भट मार पिरानो,
तटिनी तृसना जल जात सुखानो. ६
मदभाव महीधरसे अकुलाने,
व्यवसाय भये गुनलाभ अमाने;
विन बंध प्रतीति भई उर ऐसे,
पतिके भुजतें नव नागरि जैसे. ७
प्रकट्यो शिवको मग सहज सुभाए,
पथिकी चिदराव हिये हुलसाए;
चहिहुं कर जोरि जिनेश इहे मैं,
वरतो यह ज्योति अखंड हियेमें. ८
१९२ ][ श्री जिनेन्द्र