तुमरे गुनवारिध में चित ध्याये,
सु मिले तुममें फिरकें नहीं आये;
पुतरी मिसरी जल थामन ध्यावे,
लही थाह कहो किम आनि कहावे. ९
अनुभौ गत ह्वै तुमरी गति जाने,
तबही गति पंचम ह्वै विधि भाने;
इस ही हित तो मुनिनायक ध्यावें,
पर आश्रित भाव सभी छिटकावें. १०
सु सुधा निज छाक छके अविकारी,
विचरे निःशंक भये भय टारी;
तुमसों निजकुं निजतें नहिं ध्यावे,
तबलों शिवथानककुं नहि पावे. ११
सुप्रतीति यहै उर ‘‘थान’’ धरी है,
तिहतें शरना तुमारी पकरी है;
शरनागत पालक है पन तेरो,
चहिये हरनो अब तो दुःख मेरो. १२
( द्रुमिला छंद )
तिहके पद ध्यान धनंजयमें घन पाप पतंगन जेम जरें,
तसु वानी छके गुरु भेष जसी, विधि बंधन विधि छिनमें निवरें;
मद रावन ही रघुवंश धणी नित नेमप्रभु तुम जो सुमरे,
सु लहे वर दर्शन ज्ञान चरित्र अनुक्रमतें शिवनार वरे.
भजनमाळा ][ १९३