( अडिल्ल छंद )
नेम प्रभु जस गान उचारत भावसुं,
पूजे करें मन लाय होय शुचि चावसुं;
ताके विकल्पवृंद द्वंद्व सबही टरें,
ह्वै निर्विकल्प दशा शक्ति अपनी धरें.
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[१७]
श्री वीरसेन जिन – स्तवन
(दोहा)
विषम चरित रनभूमिमें, अरि विभावगन जीत;
वीरसेन निजभाव गढ, निवसे निपट अभीत.
भवभूरुहदाहन-दहन, मनमलभंजन वारि;
पामर पावन परमपद, तेरो नाम उचारि.
( अडिल्ल छंद )
वीरसेन वरवीर सुगुन रनभूमिमें,
छके महारस वीर सुरस मद घूमिमें;
शिवश्यामा अनुराग प्रबल उरमें धरे,
ह्वै निःशंक ललकार कर्मरिपुतें लरे. १
करन चपलता धारक मनमातंग पै,
भये उमगि असवार कर्मरनरंग पै;
१९४ ][ श्री जिनेन्द्र