समरसभाव सनाह सुरुचिकुल हांकिये,
साहस शुभको दंड सरल सायक लिये. २
भेदज्ञान वरमित्र संग सुखदैन है,
सहस अठारा शीलभाव वरसेन है;
सेनानी निजबोध बडो बलि बंड है,
चारित सुभट सुधीर अरिगन खंड है. ३
चक्रव्यूह मिथ्यात्व भेदी अरि सैनमें,
पैसे धारि उमंग विजय जस लेनमें;
सात सुभट तह चूरि चरन आगें धरें,
चढि सप्तम गुणथान तीन अरि छय करें. ४
सजि समाधि बल जोरी अनुपम रीस बढे,
उपशम अवनि विहाय क्षपकश्रेणी चढे;
सुभट छतीस प्रचंड नवें थलसें हरे,
दशमें सूक्षम लोभ नाशि उर रीस भरे. ५
शुक्ल ध्यान पद दुतिय चंड असि हाथ ले,
द्वादशमें गुणथान सुभट सोलह दले;
सकल घातिया प्रकृति त्रेसठ चूरिके,
अद्भुत शोभा सजी बाल शिव पूरिकें. ६
गुन अनंत परपूरी असम शोभा घनी,
परमौदारिक देह परमद्युतितें सनी;
परमभक्ति भरी इंद्र द्रव्य वसु शुभ सजें,
परम शर्मकरतार चरन तुमरे यजें. ७
भजनमाळा ][ १९५