रूप सुधारसपान सहस द्रग पानतें,
करत न रंच अघात अचल पलकानतें;
रसन तालु अस्पर्श अनाहत ध्वनि खिरें,
भव ग्रीषम तपहरन मेघ झरसी झरें. ८
जाति विरोधी जीव तजत सब वैर है,
शतयोजन चहुं ओर सुभिक्ष तहां रहै;
जंतु वध नहीं होय विभव जहां तुम तनी,
भई प्रकट इत्यादि दयानिधिता घनी. ९
करत तिहारो ध्यान सकल दुःखगन नशे,
तुम पद निज उर बसे मनुं हम शिव बसें;
तुम सब जाननहार कहा तुमतें कहूं,
चहूं ओर कुछ नहीं सुगुन तेरे गहूं. १०
मेरे औगुन ओर न नेक निहारिये,
दीनबंधु निज नाम तनी पन पारिये;
विनवुं तोही जगेश जोडी जुग पानकुं,
भव भव तेरी सेव देव! दे ‘थान’ कुं. ११
( सवैया इकतीसा )
भूमिपाल भूप कुल कंज विकसान भान,
भंजन बलीश बलिबंड मोह सेना के;
भान चिह्न केतु भवसिंधु लंघवेकुं सेतु,
दरप विहंड महामैन दुःखदेना के.
१९६ ][ श्री जिनेन्द्र