सुभग पुरंदर के पुरुसो पुर पुंडर है,
रच्यो गयो कारन तिहारे जन्म लेनाके;
तपरनवीर धीरधारी देव वीरसेन,
दायक अनंद जयो नंद वीरसेनाके.
( अडिल्ल छंद )
वीरसेन जिन वीर धीर धर जो यजे,
वीररूप निजधारी सु कायरता तजे;
ते वसुमी भुवि वसे शत्रु वसु जीती के,
विलसे सुख निजधाम मुक्तिकी प्रीति से.
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श्री महाभद्र जिन – स्तवन
( दोहा )
परिवर्तन अहि अशनकर, वैनतेय तसु वैन;
महाभद्र जिन जयति जग, नमूं नमूं सुख दैन.
( मोतीदाम छंद )
ज्यो तुम भद्र गुनातम रूप, रची चिद चिंतन केलि अनूप;
विराग कहें तुमकुं कवि केम, रच्यो शिवभामनितें अति प्रेम. १
तजे किम भोग अहो जिनदेव, लिए तुम भोग अनंत अछेव;
तज्यो किम लोभ अहो जिनराय, लही निधिज्ञान अनंत लुभाय.२
भजनमाळा ][ १९७