Shri Jinendra Bhajan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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तज्यो किम संग अहो जगपाल! धरो समवसृति भूति विशाल;
तज्यो किम बांधव वर्ग सुदेव! किये जगजंतुन बंधु स्वमेव.
तज्यो किम मोह अहो जगपार! कियो सब ज्ञेय विषे विस्तार;
तजी चलवृत्ति कहो किंह भाय! रमो तुम लोक अलोकन जाय.
तज्यो किम राज कहो जिनदेव! करे जगराज सबे तुम सेव;
तज्यो किम द्वेष कहो जगपाल! वसुविधि बंधन के तुम काल.
सही हम जान लई मनमांहि, घटी तुमरी कछु हुं नहि चाहि!
तजे सब कारज जानि असार, ग्रहे जितने जु लखे हितकार.
भली तुमरी महिमा! दुःखनाश, दियो अधमी जनकूं दिव वास;
तुहै मुखसों शशि चाहत कीन, बनात मनुं विधि तोरि नवीन!
करे तिहां षोडश भाग सु जोरि, बनें फिर ना तब डारत तोरि;
घटाबधि या हित होत सदीव, लख्यो थिर नांही परें निशि पीव.
लजे चरणाधर पाणि निहारी, कढे नहीं कंज रहे गहि वारी;
ध्वनि सुनि लज्जि भयो घनश्याम, प्रभा लखि मेरु गह्यो इक ठाम.९
लखें तव तेज चितें दुचिताय, मनूं यह भान भमें नभ मांय;
कहे उपमा तुमको कवि कोय, लसे तुमरी तुमही मधि सोय. १०
प्रभु हम दीन त्रपापट टारि, करी थुति ये अपनो हितधारी;
क्षमो हमरे सब औगुन देव, कृपा करी देहु सदा तुम सेव. ११
ग्रही शरना तुमरी अब देव, भये सब कारज सिद्ध स्वमेव;
चहे यह ‘थान’ दुहूं कर जोरि, अनातम भाव हुवे न बहोरि. १२
१९८ ][ श्री जिनेन्द्र