तज्यो किम संग अहो जगपाल! धरो समवसृति भूति विशाल;
तज्यो किम बांधव वर्ग सुदेव! किये जगजंतुन बंधु स्वमेव. ३
तज्यो किम मोह अहो जगपार! कियो सब ज्ञेय विषे विस्तार;
तजी चलवृत्ति कहो किंह भाय! रमो तुम लोक अलोकन जाय. ४
तज्यो किम राज कहो जिनदेव! करे जगराज सबे तुम सेव;
तज्यो किम द्वेष कहो जगपाल! वसुविधि बंधन के तुम काल. ५
सही हम जान लई मनमांहि, घटी तुमरी कछु हुं नहि चाहि!
तजे सब कारज जानि असार, ग्रहे जितने जु लखे हितकार. ६
भली तुमरी महिमा! दुःखनाश, दियो अधमी जनकूं दिव वास;
तुहै मुखसों शशि चाहत कीन, बनात मनुं विधि तोरि नवीन! ७
करे तिहां षोडश भाग सु जोरि, बनें फिर ना तब डारत तोरि;
घटाबधि या हित होत सदीव, लख्यो थिर नांही परें निशि पीव. ८
लजे चरणाधर पाणि निहारी, कढे नहीं कंज रहे गहि वारी;
ध्वनि सुनि लज्जि भयो घनश्याम, प्रभा लखि मेरु गह्यो इक ठाम.९
लखें तव तेज चितें दुचिताय, मनूं यह भान भमें नभ मांय;
कहे उपमा तुमको कवि कोय, लसे तुमरी तुमही मधि सोय. १०
प्रभु हम दीन त्रपापट टारि, करी थुति ये अपनो हितधारी;
क्षमो हमरे सब औगुन देव, कृपा करी देहु सदा तुम सेव. ११
ग्रही शरना तुमरी अब देव, भये सब कारज सिद्ध स्वमेव;
चहे यह ‘थान’ दुहूं कर जोरि, अनातम भाव हुवे न बहोरि. १२
१९८ ][ श्री जिनेन्द्र