( मालिनी छंद )
इति जिनगुणमाला, पर्म आनंद शाला,
सकल विघन टाला, शुद्धरूपा विशाला;
करि तन मन शुद्धि जो स्वरों धारी गावे,
विलसि सुख दीवाले, मुक्तिश्री सो लहावे.
( अडिल्ल छंद )
महाभद्र गुणभद्र भद्र मनतें भनें,
कर्म अद्रि चकचूरि अचल सुख सो सनें;
विलसे सुख सुरबाल कमलिनी बागमें,
रमें बहुरि चिरकाल वधूशिव लागमें.
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श्री देवयश जिन – स्तवन
( दोहा )
विधि घनबिन चिद् रवि छटा, दमकिं रही द्युति एन;
छकित होत छवि निरखि के, सुन नर मुनि मन नैन.
( दोधक छंद )
तारक हो तुमही जग स्वामी, बारक भवदुःख अंतरजामी;
मौन विकास दिनेश तुंही है, शुभ्र गिराधर ईश तुंही है. १
तूं विधि है चतुरानन धारी, मर्दन तूं मुर मोह मुरारी;
और कषाय विषै बसि सारे, हो तुम द्वेष दोष दुःख टारे. २
भजनमाळा ][ १९९