यद्यपि मोह तज्यो तुम स्वामी, ना करता हरता शिवधामी;
तद्यपि ध्यान धरें जिन तेरो, सिद्ध करे मन वांछित मेरो. ३
यह उरमें द्रढता हम धारी, तब पद सेव ग्रही त्रिपुरारी;
यह भवकानन भीम गुसाई, शैल विभाव तहां दुःखदाई. ४
श्रेय सबे करता तुम त्योंही, ना कछु संशय है विधि योंही;
आस्रव नीर झरे झरने है, भूरुह बंध समूह घने है. ५
मोह महामृगराज गलारे, धीर्य तहां जगजंतु निवारे;
भील मनोज तहां दुःखदानी, लूंटनकुं शुभ सोज सुहानी. ६
प्रीति जहां जुर झांसि रही है, द्वेष महा भय देन अही है;
है तृष्णा जल माल डरानी, च्हेल निगोद धरे दुःखदानी. ७
बारण मत्त जु मान जहां है, आरण महिष जु क्रोध तहां है;
मत्सर रींछ जहां घूररावे, लोभ दरार अथाह दिखावे. ८
कर्म उदै फल द्वैविध तामें, है हितकारक एक न जामें;
आरति भाव बुरे वनचारी, पावक वैद कषाय करारी. ९
अक्ष विलास पलास विकासे, आकुलभाव पिशाच जु भासे;
छांह घनी घन है भ्रम जामें, सूझत ज्ञानदिनेश न तामें. १०
भाव असत्य ढिगां भरमायो, मैं चिरतें शिवपंथ न पायो;
लब्धि बसाय गुरुमुख गाई, दीपशिखा तुमरी ध्वनि पाई. ११
चाहत हूं शिवराह गही मैं, जाचत हूं कछु और नहीं मैं;
पंथ सहायक ध्यान तिहारो, संबल दे निजबोध हमारो. १२
बाहन शुद्ध क्रिया कर दीजे, संग सधर्मिनको नित कीजे;
तो चरचा मगमें नित होवे, भक्ति सराय जहां हम सोवें. १३
२०० ][ श्री जिनेन्द्र