भजनमाळा ][ ७९
संसार समन्दर के अंदर नैया है भंवर में फंसी हुई,
कर पार ईसे खेवट बनकर तेरी चरन – शरनमें आया हूं...भव३
इन लाख चोराशी योनीमें बिन जाने तेरे भटक रहा,
अब आतमज्योति जगी उरमें तब भेद तिहारा पाया हूं...भव४
निर्भय व निडर बनकर ‘मन्ना’ है तेरी भक्तिमें लीन हुआ,
पाकर के तुमसा पद्मप्रभु मन फूला नहीं समाया हूं...भव ५
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श्री सीमंधार जिन स्तवन
मेरे मनमें आ बसा (२) प्यारे तुं जिनेश बसा,
चरनन पलक पसार खडा अघहर पथ दरशाजा...
घनन घनन घन घुमड घुमाता, कुमति संग नचाय,
निज – पर भेद समज नहि पाया, जीवन दियो बिताय...१
लाख चोराशी में अति भटका, विपद कही नहीं जाय,
पुण्य योग श्री जिनवर मिला, गुरु उत्तम शिव दाय...२
दर्शन का ‘सौभाग्य’ प्राप्त कर मन फूला न समाय,
निजानंद अनुभव रस पाउं आवागमन नसाय...३
यही सुपथ है भव तिरनेका रत्नत्रय उप लाय,
शीघ्र तज दे पर परिणतिको निजपरिणतिमें आय...४
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