Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१३४ ][ श्री जिनेन्द्र
अब गुण पर्ययके भेद दोय,
एक व्यंजन दूसरो अर्थ होय;
सो प्रथम अयोगा देहकार,
परदेश चिदानंद को निहार. ६.
अब अर्थ अगुरुलघु गुण सु द्वार,
षट् गुणी हानि वृध निज सु सार;
सो समय समय प्रति यही भांत,
जिमि जलकिलोल जलमें समात. ७.
इह भांत सु तव गुण पर्ज्ज दर्व,
हो ध्रौव्योत्पाद-व्ययात्म सर्व;
यह लोक भरो षट् दर्वसे जु,
तिनकी गुणपर्जय समय के जु. ८.
सो होत अनंतानंत जान,
स्वभाव विभाव सु भेद मान;
जे ते त्रैकाल त्रिलोकके जु,
इक समय मांहि जुगपत लखे जु. ९.
हस्तामल इव दर्पण सु भाव,
अक्षय सु उदासीनता भाव;
तब इन्द्र ज्ञान तैं मुक्ति जान,
आयो पंचम कल्याण स्थान. १०.
चारों विध देव सु सपरिवार,
निज वाहन जुवति उछाह धार;
तब अग्निकुमारके इन्द्र ठाढ,
निज मुकुट मांहिं तैं अनल काढ. ११.