१३८ ][ श्री जिनेन्द्र
आज गगने रवि अनेरो दीसे,
जेना मंगळ किरणो सोही रहे;
जाणे आत्मभानुनी झांय.....धन्य.
जाणे साधकनो सुलभकाळ.....धन्य.
सुप्रभात वडे सुवर्ष प्रगटो,
सेवकने रत्नत्रय भानु प्रगटो;
गुरु चरणोमां वारी वारी जाउं......धन्य्ा.
श्री जिन – स्तवन
(धर्मध्वज फरके छे मोरे मंदिरीये – राग)
जिनराज वधाई मोरे मंदिरीये,
जिनस्तंभ स्थपाया मारे आंगणीये;
देव ने देवेन्द्र सहु जिनवरतणी स्तवना करे,
जिनराज स्वामी विदेहमां बेठां अमीद्रष्टि करे.
आजे गंधर्वोनां गीत गाजे छे,
दैवी दुंदुभी डंका वागे छे. जिनराज. १.
इन्द्र उतर्या मंदीरे ने नवनवा नाटक करे,
भावभीनी भक्तिथी श्री जिन चरणोमां नमे;
मारे आंगणे कल्पतरू फळीयो छे,
त्रण भुवनना नाथ पधार्या छे. जिनराज. २
सुवर्णनी शोभा बनी विदेह सरखी आज तो,
हैडुं तो हेजे वहे ने रोम रोम उल्लासी रहे;