१६० ][ श्री जिनेन्द्र
धन्य धन्य जिनधर्म भर्मको मूल मिटावै,
धन्य धन्य जिनधर्म शर्मकी राह बतावै.
जग धन्य धन्य जिनधर्म यह, सो परगट तुमने किया,
भविखेत पापतप – तपतकौं, मेघरूप है सुख दिया. ३
तेज सूरसम कहूं, तपत दुखदायक प्रानी,
कांति चंदसम कहूं, कलंकित मूरति मानी.
वारिघिसम गुण कहूं, खारमें कौन भलप्पन,
पारससम जस कहूं, आपसम करै न पर – तन.
इन आदि पदारथ लोकमें, तुम समान क्यों दीजिये,
तुम महाराज अनुपम दसा, मोहि अनुपम कीजिये. ४
तब विलंब नहिं कियो, चीर द्रौपदिको बाढ्यो,
तब विलंब नहिं कियो, सेठ सिंहासन चाढ्यो.
तब विलंब नहिं कियो, सीय पावकतैं टार्यो,
तब विलंब नहिं कियो, नीर मातंग उबार्यो.
इहविधि अनेक दुख भगत के चूर दूर किय सुख अवनि,
प्रभु मोहि दुःख नासनिविषै अब विलंब कारण कवन. ५
कियौ भौनतैं गौन, मिटी आरति संसारी,
राह आन तुम ध्यान, फिकर भाजी दुखकारी.
देखे श्री जिनराज, पाप मिथ्यात विलायो,
पूजाश्रुति बहुभगति करत सम्यक्गुण आयो.
इस मारवाड – संसारमें कल्पवृक्ष तुम दरश है,
प्रभु मोहि देहु भौ भौ विषै, यह वांछा मन सरस है. ६