Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 162 of 253
PDF/HTML Page 174 of 265

 

background image
१६२ ][ श्री जिनेन्द्र
इस दुखमकाल विकरालमें तेरो धर्म जहां चले,
हे नाथ काल चौथो तहां इति भीति सबही टलै. १०
दर्शन दशक कवित्त चित्तसों पढै त्रिकालं,
प्रीतम सनमुख होय, खोय चिंता गृहजालं.
सुखमें निसिदिन जाय, अंत सुरराय कहावै,
सुर कहाय शिव पाय, जनममृतिजरा मिटावै.
धनि जैनधर्म दीपक प्रकट, पापतिमिक छयकर है,
लखि साहिबराय सुआससों, सरधा तारनहार है. ११
श्री पार्श्वनाथ जिनस्तवन
(सोरठा)
पारस प्रभुके नाऊं, सार सुधारस जगतमें,
मैं वाकी बलि जाऊं, अजर अमरपद मूल यह.
(हरिगीता १८ मात्रा)
राजत उतंग अशोक तरुवर, पवन प्रेरित थरहरै,
प्रभु निकट पाय प्रमोद नाटक, करत मानौं मन हरै.
तस फूल गुच्छन भ्रमर गुंजत, यही तान सुहावनी,
सो ज्यो पार्श्व जिनेन्द्र पातकहरन जगचूडामनी.
निज मरन देखि अनंग डरप्यो, सरन ढूंढत जग र्फियो,
कोई न राखैं चोर प्रभुको, आय पुनि पायनि गिरयो.
यौं हार निज हथियार डारे पुहुपवर्षा मिस भनी. सो ज्यो०