स्तवनमाळा ][ १६३
प्रभुअंगनील उतंगगिरितैं वानि शुचि सरिता ढली,
सो भेदि म्रमगजदंतपर्वत, ज्ञानसागरमें रली;
नय सप्तभंग-तरंग-मंडित, पापतापविध्वंसनी. सो ज्यो०
चंद्रार्चिचयछबि चारु चंचल, चमरवृंद सुहावने,
ढोलै निरंतर यक्षनायक, कहत क्यों उपमा बनै;
यह नीलगिरिके शिखर मानों मेघझरि लागी घनी. सो ज्यो०
हीरा जवाहिर खचित बहुविधि, हेमआसन राजये,
तहं जगतजन मनहरन प्रभु तन, नील वरन विराजये;
यह जटिल वारिजमध्यमानैं, नीलमणिकलिका बनी. सो ज्यो०
जगजीत मोह महान जोधा, जगतमें पटहा दियो,
सो शुक्लध्यान-कृपानबल जिन, निकट वैरी वश कियो;
ये बजत विजयनिशान दुंदुभि, जीत सूचै प्रभुतनी. सो ज्यो०
छद्मस्थपदमें प्रथम दर्शन, ज्ञानचारित आदरे,
अहं तीन तेई छत्रछलसों, करत छाया छवि भरे;
अति धवलरूप अनूप उन्नत, सोमबिंबप्रभा हनी. सो ज्यो०
दुति देखि जाकी चन्द सरमै तेजसौं रवि लाजई,
तव प्रभामंडलजोग जगमें, कौन उपमा छाजई;
इत्यादि अतुल विभूति मंडित, सोहिये त्रिभुवनधनी. सो ज्यो०
या अगम महिमासिंधु साहब, शक्र पार न पावहीं,
तजि हासमय तुम दास भूधर भगतिवश यश गावहीं;
अब होउ भवभव स्वामि मेरे, मैं सदा सेवक रहौं,
कर जोरि यह वरदान मांगौं, मोखपद जावत लहौं.