भास्युं आतमस्वरूप प्रभुजी म्हेरथी रे लोल.
उपशम रसमां झूले मारा नाथ जो,
आतमशक्ति अनंत प्रभुने सोहती रे लोल.
प्रभुना अद्भुत योगे स्वरूपनी संपत जो,
मोहादिकनो भ्रम अनादिनो ऊतरे रे लोल.
प्रभुजी मारा अनंत गुण भरपूर जो,
ज्ञान अनंत अनंत प्रभुजी सोहतुं रे लोल.
निजस्वरूपे रमता सादि अनंत जो,
करता भोक्ता निजगुणनो तुं साहिबा रे लोल,
सुंदर मूरति प्रभुजी दीठी आज जो,
देखीने सेवकने संपत सांपडे रे लोल.
अगणित गुणो प्रभुना केम गवाय जो,
सुरेन्द्रो पण तुज महिमामां मुग्ध छे रे लोल.
अध्यातम रवि ऊग्यो आजे नाथ जो,
तुज कृपाए गुरुजी मळीया मुजने रे लोल.