(छन्द पद्धरी)
जै मानस्तंभ कह्यो बखान,
तिन नमन करौं जुग जोरि पान,
है ताको वर्णन अति विशाल,
जिहि सुनत कालिमा जात काल. २
जै पहिली गलि के बीच मांहि,
दरवाजे चारि तहां बताहि;
तहं तीन कोट कीन्हें बखान,
तिन पाहि ध्वजा लहरैं महान. ३
पहिला दूजा शुभ कोट जान,
सुन कोट तीसरे का बयान;
है कोट बीच में भूमि थान,
तहां बने सु वन शोभायमान. ४
तिनमें पिक कोकिल रहे अलाप,
जिन शब्द सुनत छूटें कलाप;
तहं लोकपाल के नगर जान,
रमणीक महा शोभायमान. ५
आभ्यंतर तीजे कोट जान,
तहां तीन पीठ कीन्हीं बखान;
सो त्रै कटनीयुत शोभकार,
वैडूर्य मणिनकी कांति धार. ६
स्तवनमाळा ][ २१५