ता उपर मानस्तंभ जान,
है मूल मांहि चौकोर वान;
है उपर गोलाकार रूप,
दैदीप्यमान शोभित अनूप. ७
द्वै सहस पहल तामें गनाय,
अरु वज्रमयी नीचे बताय;
तसु मध्य फटिकमय कह्यो गाय,
मणि वैडूरज सम ऊर्ध्व जाय. ८
है तापर कमलाकार रूप,
शोभे कलशा तापर अनूप;
धुजदंड तासु उपर बताय;
जो पवन लगे जगमग कराय. ९
शुभ छत्र चमर घंटा बखान,
मणिमाला माला सुभग जान;
सो मणि अनेक मय शोभधार,
ऐसा मानस्तंभ कह विचार. १०
प्रति मानस्तंभ की दिशन चारि,
हैं चारि बावरी पूरी वारि;
दिश पूरव मानस्तंभ तीर,
नंदा नंदोत्तरा कही धीर. ११
है नंदवती नंदघोष जान,
दिश चारहु में क्रमसों बखान;
२१६ ][ श्री जिनेन्द्र