वनवासी कर – पात्र परिसह,
धरि हो धीर धरी. सफल. १
दुर्धर तप निर्भर नित तपिहों,
मोह कुवृक्ष हरी;
पंचाचार क्रिया आचरिहों,
सकल सार सुथरी. सफल. २
पहाड पर्वत अरु गिरि गुफामें,
उपसर्गो सहज सही;
ध्यान – धरा की दौर लगाके,
परम समाधि धरी. सफल. ३
विभ्रमता पहरन जर सी निज,
अनुभव — मेघ झरी;
परम शान्त भावनकी तल्लिनता,
होसी वृद्धि खरी. सफल. ४
तेसठ प्रकृति भंग जब होसी,
युत त्रिभंग संगरी;
जब सम्यक् दरस बोध सुख,
वीर्य कला प्रसरी. सफल. ५
लखि हों सकल द्रव्य गुण पर्जय,
परिणति अति गहरी;
भागचंद जब सहज हिंमिलि हो,
अचल मुक्ति नगरी. सफल. ६
२२२ ][ श्री जिनेन्द्र