Shri Jinendra Stavan Mala-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 222 of 253
PDF/HTML Page 234 of 265

 

background image
वनवासी करपात्र परिसह,
धरि हो धीर धरी. सफल.
दुर्धर तप निर्भर नित तपिहों,
मोह कुवृक्ष हरी;
पंचाचार क्रिया आचरिहों,
सकल सार सुथरी. सफल.
पहाड पर्वत अरु गिरि गुफामें,
उपसर्गो सहज सही;
ध्यानधरा की दौर लगाके,
परम समाधि धरी. सफल. ३
विभ्रमता पहरन जर सी निज,
अनुभवमेघ झरी;
परम शान्त भावनकी तल्लिनता,
होसी वृद्धि खरी. सफल.
तेसठ प्रकृति भंग जब होसी,
युत त्रिभंग संगरी;
जब सम्यक् दरस बोध सुख,
वीर्य कला प्रसरी. सफल.
लखि हों सकल द्रव्य गुण पर्जय,
परिणति अति गहरी;
भागचंद जब सहज हिंमिलि हो,
अचल मुक्ति नगरी. सफल. ६
२२२ ][ श्री जिनेन्द्र