‘सौभाग्य’ सफल हो नर – जीवन, गति पंचम धाम मिले
– प्रभु शीतल!....तेरी०
श्री जिन – स्तवन
दरबार तुम्हारा मनहर है, प्रभु दर्शन कर हर्षाये हैं;
दरबार तुम्हारे आये हैं. (२)
भक्ति करेंगे चितसे तुम्हारी, तृप्ति भी होगी चाह हमारी;
भाव रहे नित उत्तम ऐसे, (२) घटके पटमें लाये हैं. — दरबार० १
जिसने चिंतन किया तुम्हारा, मिला उसे संतोष सहारा;
शरणे जो भी आये हैं, (२) निज आतम को लख पाये हैं. — दरबार० २
विनय यही है प्रभू हमारी, आतमकी महके फुलवारी;
अनुगामी हो तुम पद पावन (२) ‘वृद्धि’ चरण शिर नाये हैं. — दरबार० ३
श्री जिन – स्तवन
गूंजे मंगल गीत वधाई,
देखो सोन सुगढमें आज.......(२)
नाथ सीमंधर महिमा भारी, तीर्थ सुवर्णकी शोभा न्यारी,
पंचम स्वर शहनाई गाती, आवो सकल समाज....(२) गूंजे.
गगन केसरी ध्वज लहराते, जग – जन को संदेश सुनाते,
अशुभ भावसे बचो पुण्यमय, यहां जुडा है साज. (२) गूंजे.
२२४ ][ श्री जिनेन्द्र