धन्य कहान मोतीके नंदन, हित मित भाषी शीतल चंदन.
वस्तुस्वरूप दिखाकर धारा, निश्चय-नय का ताज (२) गूंजे.
हम भी आतम – द्रव्य संजोलें, धर्म-सुमनकी माल पिरोलें;
नैन वचन ‘सौभाग्य’ सफल हो, कर भक्ति जिनराज, (२) गूंजे.
श्री गुरुदेव – स्तवन
मनकी मैना मीठे स्वरमें गाती राग मल्हार रे,
जैन – धरमका खिला बगीचा आओ गूंथें हार रे....मनकी०
उमराळा सौराष्ट्र देशमें, श्रेष्ठी मोतीलाल घर, (२)
माता उजमबा ने जाया, पुत्र – रतन कुलश्रेष्ठ वर. (२)
द्वितीया के चंदा सम जिसकी, दिपे कला संसार रे....मनकी०
अल्प समयमें पढ – लिख जिसने, खूब किया व्यापार था, (२)
किन्तु कपट छल रुचा न जिसको, हेय जगत व्यवहार था. (२)
बालब्रह्मव्रत धार बढावो, करने निज उद्धार रे....मनकी०
ज्ञान-ज्योतिमें सत् – पथ देखा, परखा हृदय-कसोटी पर, (२)
पंथ-मोहकी पट्टी फेंकी, समयसारका अनुभव कर. (२)
परम दिगंबर धर्म शरण ली, भवोदधि – तारणहार रे....मनकी०
जन्मधाममें जन्मजयंती, रवि-शशि मंगलकार रे, (२)
महावीर से करें प्रार्थना, दीर्घायु हो गुरुराज रे. (२)
युग युग तक ‘सौभाग्य धरमकी, इनसे हो जयकार के...मनकी०
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स्तवनमाळा ][ २२५