श्री जिन – स्तवन
नीरखी नीरखी मनहर मूरत तोरी हो जिनंदा;
खोई खोई आतम निज निधि पाई हो जिनंदा....नीरखी.
नासमजीसे अबलों मैंने, परको अपना मानके, (२)
मायाकी ममतामें डोला, तुझको नहीं पिछान के, (२)
अब भूलों पर रोता यह मन मोरा हो जिनंदा....नीरखी.
मोह दुःखका घर है, मैंने आज चराचर देखा है, (२)
आतम धनके आगे जगका, झूठा सारा लेखा है, (२)
मैं अपने में घुल – मिल जाउं, वर पाऊं जिनंदा...नीरखी.
तू भवनाशी मैं भववासी, भवसे पार उतरना है. (२)
शुद्ध स्वरूपी हो कर तुझसा, शिवरमणी को वरना है, (२)
ज्ञान-ज्योति ‘सौभाग्य’ जगे घट मेरे हो जिनंदा....नीरखी.
श्री जिन – स्तवन
(तर्ज – ढूंढो रे साजना)
आये आये रे जिनंदा, आये रे जिनंदा,
तोरी शरणमें आये;
कैसे पावें तुम्हारे गुण गावें रे,
मोहमें मारे मारे, भव भवमें गोते खाये....आये०
जग झूठेसे प्रीत बढाई, प्रीत किये मनमाने,
सद्गुरु-वाणी कभी न मानी, लागे भ्रमरोग सुहाने –
कैसे पावें....
२२६ ][ श्री जिनेन्द्र