श्री अजितनाथ जिन – स्तवन
(छन्द पद्धरि)
जय जय श्री अजित जिनेश देव,
तुम चरन करूं दिनरैन सेव;
जय मोक्षपंथ दातार धीर,
जय कर्मशैल भंजन सुवीर. १.
जय पंच महाव्रत धरनहार,
तजि राज्य सबै वन ध्यान धार,
जय पंच समिति पालक जिनंद,
त्रय गुप्ति करन वसि धरमकंद. २.
धरि ध्यान भये चिद्रूप भूप,
गिरि मेरु समानों अचल रूप.
जय घाति करमको नाश ठान,
उपजायो केवलज्ञान भान. ३.
तब समवसरण रचना बनाय,
हरि हरिष्यो मन आनंद पाय;
कछु करिहों वरनन भक्ति भाय;
जिम बोलत है पिक अंब खाय. ४
जय पंच रतनमय धूलशाल,
चउ गोपुर मनमोहन विशाल,
जय मानस्थंभ सुरंग चंग,
लखि मानी नावैं आय अंग. ५.
स्तवनमाळा ][ २३३