चउ वापी निर्मल नीर सार,
सुभ बोलत जहं चकवा मरार;
जल भरी खातिका गिरद रूप,
पुष्पनिकी बाडी अति अनूप. ६
सुभ कोट दिपै जिम तेज भान,
नृतसालामें गावें कल्यान;
पुनि वन शोभा वरनी न जाय,
रजत वेदी बहु धुज उडाय. ७.
फिर कोट हेममय सुघर सार,
बहु कल्पद्रुप बन शोभकार;
नव रतनराशि शोभित उतंग,
ऊंचे मंदिर जहं बहु सुरंग. ८.
फिर फटिक कोट शोभा अमान,
मंगल द्रव्यादिक धूपदान;
मधि द्वादस बनिय सभा अनूप,
मुनि सुर नर पशु बैठे सुभूप. ९.
विचि तीन रतनमय तुंग पीठ,
वेदी सिंहासन कमल ईठ;
जिन अंतरीक आनन सुचार,
धर्मोपदेश दे भव्य तार. १०.
सित छत्र तीन उद्योतकार,
तरु है अशोक जन शोक टार;
२३४ ][ श्री जिनेन्द्र