गंधोद विष्ट जुत पुष्प विष्ट,
नभि दुंदुभि बाजैं मिष्ट मिष्ट. ११.
अति धवल चंवर चौंसठ ढुराय,
भामंडल छबि वरनी न जाय;
एसी विभूति जिनराज देव,
नमि नमि फुनि फुनि करि हों जु सेव. १२.
(धत्ता)
श्री अजित जिनेसुर, नमत सुरेसुर, पूजें खेचरगण चरणं,
नरपति बहु ध्यावें, शिवपद पावें, ‘रामचंद्र’ भवभय हरणं. १३.
श्री संभवनाथ जिन – स्तवन
(दोहा)
संभव भव भय दूर कर, निजानंद रस पूर;
निज गुण दाता जगतपति, मम उर बसो हजूर.
(छंदः तोटक)
जयवंत जगतपति राजत है,
समवश्रुतमें छवि छाजत है;
शशि – सूरज कोटिक लाजत है,
जिन देखत ही अघ भाजत है. १
तहां वृक्ष अशोक महान दिपै,
तिहिं देखत ही सब शोक छिपै;
चतुषष्ठि सु चामर छत्र त्रयं,
हरि आसनं शोभित रत्नमयं. २
स्तवनमाळा ][ २३५